मंगलवार, 7 मई 2013

मेरी फैली हुयी बाहें....


ये मेरी –

फैली हुयी बाहें दो –

शाख़ पेड़ की हो,

कब से मुंतज़िर हैं तेरी.....

पतझड़ है तो क्या हुआ –

पलाश हो,

खिल तो सकते तुम –

मेरी शाखों पे.... ।

-नीहार ( चंडीगढ़, 2 अप्रैल 2013)